This is my last poem in IIIT.. dedicated to all my friends and batchmates (Class of 2010,IIIT-H) Thank you guys for leaving me with such wonderful memories in my heart.
वो दस बाय दस के हॉस्टल कमरे में,
दरवाज़े के पीछे लगे फटे कैलेंडर में,
अपने कॉलेज के आखरी दिनों को गिनता हूँ,
और फिर वही खयालो में कहीं खो जाता हूँ |
वो पहले दिन जब सीनियर से छुप छुप के निकलते थे,
और खुद के बेच के लोग भी पराये से लगते थे,
याद आती है वो दोस्तों से पहली मुलाकातें,
याद आते हैं वो सारे किस्से सारी बातें,
वो रात भर जग कर नाईट-आउट मारते थे,
और फिर सुबह क्लास में जाते ही पिछली सीट पर सो जाते थे,
वो कैसे कभी अटेंडेंस के लिए भाग कर क्लास पहुँचते थे,
और अटेंडेंस होते ही पिछले दरवाज़े से चुपके से निकल लेते थे|
वो कैसे आखरी मिनट पर,
कैसे तैसे असाइनमेंट कॉपी करते थे,
और आखरी रात पढके
किसी तरह एक्साम पास करते थे|
कैसे घर से आये खाने पर यूँ झपटते थे,
की बड़े बड़े डब्बे भी मिनटों में खली हो जाते थे|
कैंटीन के खाने की बुराई करते न थकते थे,
पर ट्रीट के नाम पे भरे पेट भी पहुँच जाते थे|
वो कैसे हर छोटी छोटी बातों पर जशन के बहाने ढूंड लेते थे,
और कभी छोटी छोटी बातों पर यूँ लड़ते झगड़ते थे|
फिर अगले ही पल गले मिल के कहते थे,
“साले! जाने भी दे अब “
इन सुन्दर यादों के बसेरे से जैसे ही मैं बाहर निकलता हूँ,
अपने आप को वर्त्तमान के कटघरे में खड़ा पता हूँ |
आज बाहर निकल के लाखों कमाना भी बेकार लगता है,
इस जगह से दूर जाने में भी एक डर सा लगता है |
पर ज़िन्दगी में आज एक ऐसा मोड़ आया है,
कि ना चाहते हुए भी इसे छोड़ना ही पड़ेगा |
इन सुनहरे चार सालों को अलविदा कहना ही पड़ेगा |
पर ऐ-दोस्तों आज बस एक बात कहना चाहता हूँ ,
कल जब मैं खुशियों में हाथ नहीं, गले मिलना चाहूँगा ,
कल जब मैं गम में किसी के सीने से लिपट के रोना चाहूँगा,
कल जब मैं अपनों के नाम पर परायों से घिरा होऊंगा,
तब उस तनहाई में तुम बहुत याद आओगे ..
बहुत याद आओगे….